वैश्विक तकनीकी पटल पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। दुनिया भर के देश अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को केवल एक तकनीक या टूल के रूप में नहीं देख रहे, बल्कि इसे अपनी संप्रभुता और सामरिक रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। एनवीडिया की वीपी सोवेरन एआई कैलिस्टा रेडमंड ने सोमवार को 'एआई इंडिया इम्पैक्ट समिट' में यह अहम बात कही। उन्होंने साफ किया कि भारत समेत दुनिया के देश अब एआई के किसी एक घटक पर नहीं, बल्कि इसकी पूरी कहानी और बुनियादी ढांचे पर फोकस कर रहे हैं। यह बदलाव भारत जैसे देशों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपनी खुद की एआई क्षमताओं को विकसित करने की दौड़ में शामिल हैं।

हार्डवेयर से लेकर मॉडल्स तक

सम्मेलन में बोलते हुए रेडमंड ने कहा कि जब वह वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों से बात करती हैं, तो एक स्पष्ट ट्रेंड दिखाई देता है- राष्ट्र 'लॉन्ग गेम' (लंबी पारी) खेलने की तैयारी में हैं। वे केवल पहली रिलीज या किसी एक एप्लिकेशन के सफल होने का इंतजार नहीं कर रहे। इसके बजाय, उनकी नजर पूरे टेक्नोलॉजी स्टैक पर है।रेडमंड ने बताया कि सरकारें अब हार्डवेयर, फाउंडेशनल मॉडल्स और उस इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने पर जोर दे रही हैं जो बेहतरीन एप्लिकेशंस बनाने के लिए जरूरी है। यह दृष्टिकोण केवल सॉफ्टवेयर खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों को मजबूत करने पर केंद्रित है। इसे ही 'सोवेरन एआई' का नाम दिया गया है, जिसमें स्थानीय टीमों द्वारा स्थानीय डेटासेट पर प्रशिक्षित लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स शामिल हैं।

ओपन सोर्स: संप्रभुता की चाबी

समिट के दौरान टेक लीडर्स ने 'ओपन सोर्स एआई' की भूमिका पर भी गहन चर्चा की। मोजिला के अध्यक्ष मार्क सुरमन ने इस बात पर जोर दिया कि एआई का केंद्रीकरण किसी भी देश की डिजिटल संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।सुरमन के अनुसार, ओपन वेब और ओपन सोर्स टेक्नोलॉजी इस खतरे का जवाब हैं। उन्होंने कहा कि ओपन सोर्स की मूल भावना यही है कि कोई भी, कहीं भी, अपनी शर्तों पर तकनीक का निर्माण कर सके। हालांकि इसमें अपनी चुनौतियां हैं, लेकिन यह तकनीक को इस तरह डिजाइन करने की आजादी देता है जिससे देशों को अपनी संप्रभुता बनाए रखने का बेहतर मौका मिलता है। रेडमंड ने भी माना कि दशकों से ओपन सोर्स एक 'ग्रेट लेवलर' (समान अवसर प्रदान करने वाला) रहा है।

भारत का एआई मिशन: आत्मनिर्भरता की ओर कदम

भारत सरकार की रणनीतियां रेडमंड के इन विचारों से पूरी तरह मेल खाती हैं। भारत का 'इंडिया एआई मिशन' एक व्यापक इकोसिस्टम बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इसका उद्देश्य कंप्यूटिंग तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाना, डेटा की गुणवत्ता बढ़ाना और स्वदेशी एआई क्षमताओं को विकसित करना है।इस साल के समिट की एक बड़ी उपलब्धि उन 12 भारतीय स्टार्टअप्स की प्रगति रही, जिन्हें इंडिया एआई मिशन के तहत चुना गया है। ये स्टार्टअप्स भारतीय डेटासेट और भाषाओं पर प्रशिक्षित स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल विकसित कर रहे हैं। इनका लक्ष्य भारत की भाषाई विविधता और विशिष्ट क्षेत्रीय जरूरतों को पूरा करना है, जो पश्चिमी एआई मॉडल्स अक्सर नहीं कर पाते।

आगे की राह: परिणामों पर फोकस

सोमवार को शुरू हुए इस समिट का मुख्य फोकस सिर्फ चर्चाओं पर नहीं, बल्कि ठोस परिणामों पर है। नीति निर्माताओं और उद्योग के दिग्गजों का मानना है कि एआई इकोसिस्टम का उपयोग दक्षता बढ़ाने, उत्पादकता में सुधार करने और अर्थव्यवस्था के लिए एक 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' (गुणात्मक प्रभाव) पैदा करने में किया जाना चाहिए।रेडमंड का यह बयान कि "देश एआई की पूरी कहानी देख रहे हैं," यह दर्शाता है कि एआई अब केवल आईटी विभाग का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय एजेंडा का एक मुख्य हिस्सा बन चुका है। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी आबादी के लिए समावेशी समाधान बनाना चाहते हैं, यह 'संप्रभु एआई' ही भविष्य का रास्ता है।